इश्क़ मुबारक

नजाने किस दौर में उल्फत कर बैठे हम
जिसकी बदौलत आज दिल बंजर
और आँखे है नम |

 
ज़िन्दगी भी खेल अजीब से खेलती है
ना लिखा हो सफर जिन के साथ
उन्ही से दिल लगा बैठती है |

 
अब अफ़सोस कर के जाए भी तो कहाँ
ये तो वो बारिश है जो चाहे जितना बरसे
करती है बंजर ही अदा |

 
अब दिल का क्या कहे जनाब
इसकी फितरत से तो ज़माना वाकिफ है
जो आ गया किसीपे  तो अड़ सा जाता है |

 
लाख सितम और हज़ारो बेरहमिया
सब गवारा है इसे
नहीं चलता ज़ोर फिर कोईइस फितूर के आगे |

 
उल्फत की बात ही कुछ निराली है
करने जाये तो बाज़ारो में बिकती नहीं
और बेचने जाए तो कोई मालिक नसीब होता नहीं |

 
ये तो बस यूँ ही कहीं भी किसी भी वक़्त हो बैठती है
न देखती है दिन ना रात
ना हालात ना इंसान
ना सही ना गलत
ना आबरू ना इज़्ज़त
ना रूप ना रंग
ना उम्र ना लिहाज़
ना हया ना खौफ |

 
यूँ ही तो नहीं जो खूब फ़रमाया होगा ग़ालिब ने,

 

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश है ग़ालिब
के लगाए ना लगे और बुझाये ना बने

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